रात्रि चिंतन : मन की बात और उसका विश्लेषण
रात्रि चिंतन : मन की बात हम भीड़ में भी अकेले हैं। जब कोई पूछता है, “कैसे हो?” तो हम “सब ठीक है” बोल तो देते हैं, पर अंदर से ठीक होते नहीं हैं। रिश्ते तो हैं, पर बातचीत नहीं होती। एक ही घर में रहते हैं, एक ही टेबल पर खाना खाते हैं और फिर अपने-अपने कमरों में चले जाते हैं। फोन पर हजारों मित्र हैं, अलग-अलग ग्रुप हैं, पर फिर भी एक खालीपन है। आपने कब अपने अपनों के साथ बैठकर दिल की बात की? घर के लोग हमारे पास हैं, पर हमारे साथ नहीं हैं। किसी का पास होना और किसी का साथ होना, दोनों में बहुत फर्क है। एक महिला दिन भर घर का काम करती है, खाना बनाती है, बच्चों और पति का ध्यान रखती है, उन्हें परोसती है, उनका इंतजार करती है। वह उन सबकी उन्नति के लिए ईश्वर से प्रार्थना भी करती है। एक दिन उसने अपने पति से कहा, “मैं इस घर में तो हूँ, पर मैं आपके जीवन में नहीं हूँ।” पति ने कहा, “क्या बात करती हो! तुम तो हर जगह हो। बच्चों का और मेरा ध्यान रखती हो। मेरी सुबह की चाय से लेकर रात के सोने तक, बच्चों की पढ़ाई, उनका टिफिन देने से लेकर उनकी देखभाल तक, सब तुम ही करती हो।” तब वह मुस्कुराई और बोली, “हर जगह तो हूँ, प...